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Sad Shayari ! सैड शायरी ! Sad shayari whatsapp status .

 Sad shayari in hindi 

Sad Shayari ! सैड शायरी !


 Ijazat nahi thi jise paraye mardoon se baat krne ki,

Ghar walo ne use Dahej me bistar diya hai ..


Sad Shayari ! सैड शायरी !


 Kisine paaya hai muft me woh shaks . 

Jo chahiye tha mujhe har kimat pe !




Sad Shayari ! सैड शायरी !


 


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Sad love Shayari ! सैड शायरी !


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Some poetries you may like , 

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सबकी सोच सिमट जाती है, बात जैसे ही पीरियड्स की आती है।


नाम सुनते ही चुप कराया है,


ये आया किसी से ना बताया जाता है।


हर महीने दर्द को सहना पड़ता है,


पीड़ा में ठीक हूं ये कहना पड़ता है।


सशक्त नारी भी कमजोर पड़ जाती है,


जैसे ही यह माहवारी आती है।


हर महीने मुश्किल दिनों से करती है संघर्ष वो,


फिर भी जमाने के नजर में अशुद्ध ।


उसकी संघर्ष की शक्ति मलीन पड़ जाती है,

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मूझे जानती हैं वो तमाम उदासियां, जो उदास करती हैं तुम्हें... मुझे सुनते है वो सारे गीत, जो तुम सुनाना चाहो किसी को... मुझे पूछना है तुमसे, कि तुम्हारा दिन कैसा रहा... मैं खो देना चाहता हूं, तुम्हारे दुख के हर कारण को..


मैं जानना चाहता हूं, हर खुशी, हर दर्द तुम्हारा...


 मै सूनना चाहता हूं मौन तुम्हारा,


जो कोई और न जान सके..


ये शख्स तुम होते,


तो क्या नही होता मेरे पास..


मैं चाहता हूं वो शख्स बनना,


~ सतविंदर सिंह 'सोनू'




जैसा मैं चाहता था तुम्हें अपने लिए ।

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 ये मैं क्या कर बैठा


ये अपना हाल क्या कर बैठा। पुरानी यादें को ताज़ा कर बैठा।


जहाँ से ख़त्म किया था सब वहीं से मैं शुरुआत कर बैठा।


बीते हालात मेरी जिंदगी से मुलाकात पन्नों पर उतार बैठा।


 मुस्कुराना हमें पसंद नहीं और में अपने दिल को हँसा बैठा।


कुछ लम्हें भुलाए नही थे की अपनी कहानी याद कर बैठा।


एक पत्थर इंसान को ख़ुदा मानता था उन्हें याद कर बैठा।


दूर है मुझसे फिरभी में उस चाँद से मोहब्बत कर बैठा।

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मिलते नहीं अब किसी से,


लोगों का मिज़ाज़ अब पहले सा कहाँ रहा,


वो रौनक अब ख़त्म हो गई हैं अपनों के बीच, उनके मिलने का अंदाज़ भी अब पहले सा कहाँ रहा,


कभी हर शाम होतीं थी दोस्तों संग महफिले, ..मगर अब व्यस्त हैं सब, किसी को वक्त ही कहाँ रहा,


 ये वक्त बदल गया, वक्त के साथ बाकी सब भी, बिन बदले कोई ठीक पाए, ये वो दौर ही कहाँ रहा,



मगर फिर तू भी पहले जैसा कहाँ रहा।

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मैं तुम्हारे पर्स और मोजे से लेकर बुढ़ापे में चश्मा और दवाई तक सब कुछ सम्भाल रखना चाहती हूं,


जैसे रखती है हर माँ अपने बच्चे का ठीक वैसे ही मैं ताउम्र तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का ख़्याल रखना चाहती हूं 

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सबने चेहरे की हँसी देखी सबने हँस हँस के बस मेरे में कमी देखी काश कोई होता जो आकर बोले मैंने तेरी आँखो में दबी नमी देखी


ऐसे तो गम है सबके पास खुशियों की है सबको तलाश काश कोई होता जो आकर बोले मेरी खुशियों में है तेरा हाथ तेरे गम मे रहेगा मेरा साथ ! 

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बालों की लटों को


संवारने से लेकर पैर में पायजेब पहनाने तक मैं सब तुम्हारे लिए करना चाहता हूं,


@untoldalfaz



जिसको देख दुनिया दे मिशाल मोहब्बत की मैं वह तुम्हारे लिए लड़का बनना चाहता हूं ! 


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अगर


अगर ये दिल तेरा मैला ना होता


तो मेरी आँख का काजल भी ना फैला होता


अगर चालाकियाँ समझ पाती तो मेरा दिल यूँ ना बहला होता


तू किसी और को ना अपनाता और ये दिल ना अकेला होता


• आग लगती ना फ़िज़ाओं में अगर


तो हर एक ख़्वाब रुपहला होता


चोट इतनी भी ना गहरी होती अगर ये प्यार ना पहला होता ! 

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हम बैठेंगे किसी दिन इतना करीब आकर के मैं तुम्हारी और तुम मेरी साँसों की गर्माहट महसूस कर सको


और देख सके


हम एक दूसरे की आँखों में एक दूसरे की आँखों की पुतलियाँ


और तुम रख मेरे सीने में अपना सिर और सुन सको मेरे दिल की धड़कन जो तुमको करीब पाकर और तेजी से धड़क रही हो !

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जिंदगी बीत जाए अदा करते करते


उधार इतना कभी बाकी न रखना


कुछ नापसन्दगी भी जायज है दोस्त


सबको अपने हक में राजी न रखना


कमान शख्सियत की थामे रखना खुद हाथ दूसरों के हर एक बाजी न रखना शायद में Untoldalfaze


खुद अपने आँसू पोंछ लेना चाहे दंगे की सूरत में कोई साथी न रखना


मशविरे सुहाने देते हैं लोग दुनिया के गुंजाइश आजमाइश की काफी न रखना


तुम जो हो बस वही रहना हरदम यारा असलियत से अपनी नाइंसाफी न रखना ! 

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KUCH KAHANIYAN PADHIYE ...

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"यादें शादें डॉट कॉम"


15 मई, 30 नवंबर और 31 दिसंबर ये तीन तारीखें थी जिन्हें समीर कभी चाहकर भी भूल नहीं पाता था। ये तारीखें स्पेशल इसलिए भी थी क्योंकि इन पर सिमरन, अंकिता और नीना का जन्मदिन आता था।


आज बेशक वो साथ नहीं थीं, लेकिन उनकी यादें, उनसे जुड़ी बातें, हमेशा साथ थी, और साथ रहेंगी भी। शायद यही कारण था कि दिल से निकालना चाहे भी, तब भी समीर के दिल से ये तारीखें निकलने का नाम ही नहीं लेती थी।


बातों बनाम यादों का ये सिलसिला चलते चलते अब दो दशक से भी ज्यादा पार कर चुका था, लेकिन ऐसा लगता था मानो कल की ही बात हो। सच ही है, बातें भले ही पुरानी हो जाएं, लेकिन यादें बनकर हमेशा साथ चलती रहती हैं।

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No 2 :

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पूछ बैठा, "पंडित जी, आपने 3 बार चम्मच से चरणामृत दिया, तीन नंबर तो अशुभ माना जाता है ना?"


क्यों/अ


पंडित जी बोले, "नहीं, अशुभ नहीं किंतु 3 की संख्या तो इस संसार में सबसे शुभ है। इसी के बलबूते तो दुनिया चल रही है। ये 3 चम्मच चरणामृत ब्रह्मा जी, विष्णु जी, और महेश जी के सूचक हैं। 


"पर आपसे पहले वाले पंडित जी तो चम्मच से एक ही... दिया...... करते थे.. वो तो कहते थे.... कि सृष्टि एक है, भगवान एक हैं, इसीलिए प्रसाद भी एक ही बार मिलता है...", अभी रोहित की बात ठीक से पूरी भी नहीं हुई थी कि तब तक पंडित जी दूसरी ओर खड़े एक दूसरे भक्त की व्यथा सुनने में व्यस्त हो गए थे। बुदबुदाते हुए रोहित ने अपने आप से कहकर ही अपनी बात पूरी तो कर ली, फिर पलटकर मंदिर के गेट तक पंहुचा, अपनी लाल-पीली चप्पल पहनी और मन में यही सवाल लेकर वापस घर की ओर चल पड़ा कि "कौन सही है, और कौन ज्यादा


सही?

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हल्की सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। हालांकि अब हल्की ही पड़ा करती थी, जिस में स्वेट-शर्ट आदि में गुजारा चल जाया करता था। कड़ाके की, दांत किटकिटाने, हाड कंपकंपाने वाली ठंड तो अब पड़ती नहीं थी, जो रमन ने अपने बचपन से लेकर जवानी तक देखी और महसूस की थी।


बहरहाल, इस मौसम में आज जब रमन ने अपने बेटे को च्यवनप्राश का चम्मच भरकर हाथ में पकड़ाया, तो उसे अपने बचपन वाला च्यवनप्राश और उस से जुड़ी कुछ बातें दिमाग में दस्तक दे गई।


सोच रहा था कि बदलते दौर के साथ च्यवनप्राश का स्वरूप भी कितना बदल गया था। अब च्यवनप्राश कई वैरायटी और फ्लेवर में आने लगा था, जो उनके समय में केवल 'नीले ढक्कन' और 'लाल ढक्कन' वाला ही आया करता था ।


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फिलहाल घर चलाने में बड़ी मुश्किल हो रही थी। नई नौकरी मिल नहीं रही थी, कमाई का और कोई साधन था नहीं, जो थोड़ा बहुत पैसा जोड़ा था उस से ही घर चल रहा था, लेकिन ऐसा भी कब तक हो पाता, बचत का पैसा आज नहीं तो कल खत्म होना ही है। अक्षरा को अभी लैपटॉप भी नया दिलाया था क्योंकि पुराने में दिक्कतें आने लगी थी। बढ़ते खर्चों के बीच एक एक दिन काटना अब मुश्किल हो रहा था । , बड़ा मुश्किलों भरा दौर था ।


इधर देश में अब कोरोना पॉजिटिव केस की रफ्तार कम क्या होने में लगी, स्कूलों को सुनहरा मौका मिल गया इसका फायदा उठाने का। सभी अभिभावकों पर दबाव डाला जाने लगा कि वे सब नियमित मासिक फीस के साथ अब वार्षिक चार्ज का भी भुगतान कर दें। यूं कि था तो ये अनैतिक ही, क्योंकि जब बच्चे स्कूल जा ही नहीं रहे,

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उधर, आपदा के ऐसे विकट समय में भी कुछ धंधे थे जो सबसे ज्यादा फल-फूल रहे थे, जैसे - निजी अस्पताल (जो अस्पताल कम, होटल ज्यादा लगते थे), मेडिकल स्टोर, सब्जी-फल व किरयाना विक्रेता, और प्राइवेट स्कूल (जो इंसानियत को साइड में रखकर किसी भी तरह अपनी "सारी फीसें" वसूलने से मतलब रखते थे, बस!) ।


कहना तो नहीं चाहिए लेकिन सरकारी अस्पतालों व सरकारी स्कूलों के हालात से सभी परिचित हैं। चाह कर भी उधर का रुख मिडल क्लास सेगमेंट वाले नहीं कर पाते। काश, सरकारें और व्यवस्थाएं ऐसी होती कि दी इन लोगों को ऐसी निजी दुकानों की ओर भागना ही नहीं पड़ता।


बहरहाल, एक ऐसे ही निजी स्कूल में पढ़ती थी अक्षरा। उसके पिता अभिषेक की नौकरी 5 महीने पहले कोरोना काल में चली गई थी और उधर, आपदा के ऐसे विकट समय में भी कुछ धंधे थे जो सबसे ज्यादा फल-फूल रहे थे, जैसे - निजी अस्पताल (जो अस्पताल कम, होटल ज्यादा लगते थे), मेडिकल स्टोर, सब्जी-फल व किरयाना विक्रेता, और प्राइवेट स्कूल (जो इंसानियत को साइड में रखकर किसी भी तरह अपनी "सारी फीसें" वसूलने से मतलब रखते थे, बस!) ।


कहना तो नहीं चाहिए लेकिन सरकारी अस्पतालों व सरकारी स्कूलों के हालात से सभी परिचित हैं। चाह कर भी उधर का रुख मिडल क्लास सेगमेंट वाले नहीं कर पाते। काश, सरकारें और व्यवस्थाएं ऐसी होती कि दी इन लोगों को ऐसी निजी दुकानों की ओर भागना ही नहीं पड़ता।


बहरहाल, एक ऐसे ही निजी स्कूल में पढ़ती थी अक्षरा। उसके पिता अभिषेक की नौकरी 5 महीने पहले कोरोना काल में चली गई थी और



लॉकडाउन में थोड़ी ढील दिए जाने के साथ ही मंदिर फिर से • खुलने लगे, तो रोहित का दिल मानो खिल सा गया। इस दिन का ही वो कई महीनों से इंतजार कर रहा था। बस फिर क्या था, पूजा का थाल और सामग्री लिए पंहुच गया मंदिर।


इतने महीनों में वहां काफी कुछ बदल गया था। अब मास्क पहनकर ही प्रवेश मिलने लगा था, जगह जगह सैनिटाइजर के पैर से चलाने वाले डिस्पेंसर दिखने लगे थे, और सबसे बड़ा बदलाव जो रोहित ने देखा वो था पंडित जी का भी बदल जाना। पूछने पर पता चला कि पहले वाले पंडित जी लखनऊ से थे, सो 3-4 महीने पहले अपने परिवार के पास वापस घर चले गए।



नए पंडित जी नौजवान टाइप के थे और थोड़ी मॉडर्निटी भी उनके हाव भाव में झलक रही थी। खैर, इस से भक्तों को क्या लेना, उनका ज्ञानी होना जरूरी है, फिर मॉडर्न हों या ट्रेडिशनल, क्या फर्क पड़ता है। लेकिन रोहित को शायद थोड़ा


फर्क पड़ा जब पंडित जी ने उसे चरणामृत दिया।

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"लक्ष्मी मैया का प्रसाद


वो बेईमान तो बिलकुल नहीं था। हां, एकाध बार की भूल-चूक को छोड़ दें, तो शायद ही कभी उसने जानबूझ कर किसी के साथ कोई बेईमानी की होगी। इतना ईमानदार होने के बाद, थोड़ी टेंशन तो उसकी जिंदगी


में भी थी।


बात बस इतनी भर थी, कि वो पास अप्रत्यक्ष रूप से आने वाले रुपए पैसे को लक्ष्मी मैया का प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लिया करता था। अब मान लीजिए उसने 78 रुपए की किसी चीज को लेने के लिए 100 रुपए का भुगतान किया, और दुकानदार ने 22 की जगह उसे 32 रुपए वापस लौटा दिए। बताइए, ऐसे में उस बेचारे की तो कोई गलती है नहीं, न ही उसने दुकानदार के साथ कोई धोखा किया। है कि नहीं?

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"कुछ कुछ लोचा


1/3


एक चैनल पर आज अपने ज़माने की एक बड़ी खूबसूरत "कुछ कुछ होता है" आ रही थी। लां हिंदी फिल्म नि


उमंग को आज भी याद था 1998 का वो साल जब ये फिल्म रिलीज हुई थी। इस फिल्म की दीवानगी उस दौर के युवाओं में कुछ अलग ही थी। ऐसे पागलों की तरह टूट कर पड़ते थे टिकट खिड़की पर, कि दी कहानिस पूछो मत। सारे के सारे शो... ह हाउसफुल।


अच्छा तब ना, मल्टीप्लेक्स नहीं हुआ करते थे, बस एक परदे पर सिनेमा हॉल में एक ही फिल्म चला करती थी, और शो जब हाउसफुल हो जाया करते थे, तब कई लोग खड़े होकर, तो कई लोग अपने लिए ! 

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बहरहाल, जब भी कभी ऐसा होता, वो बस यही मान 2/2 कि शायद दुकानदार का ही बेईमानी का घड़ा भर गया होगा, और घड़े से निकला ये "एक्स्ट्रा माल" उसकी झोली में आ गिरा होगा। इस कारण वो बस हाथ जोड़कर उस पैसे के प्रसाद को सहर्ष स्वीकार कर लिया करता था।


लेकिन असल समस्या तो यहीं से शुरू हुआ करती थी। ये 10 रुपए types की रकम का खाया प्रसाद, उस समय तो उसे हजम हो जाता था, किंतु प्रसाद की इस ही रकम का कई गु निकल जाया करता था। गुना, कहीं दूसरी जगह पर


अब समझ उसे ये नहीं आता था कि वो तो खुद किसी से बेईमानी या धोखा करता नहीं था, फिर क्यों उसको इसकी इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती थी?


क्या लक्ष्मी माता का ये प्रसाद ग्रहण करना उसके लिए गलत था?

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कौन सही, कौन ज़्यादा सही?


मंदिर की घंटियां बजतीं, तो उसके अंदर एक अलग ऊर्जा का संचार सा होने लगता। लेकिन कोविड काल में लॉकडाउन के चलते भगवान के दर्शन करने वो मंदिर भी नहीं जा पाता था। शायद किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि भक्तों के लिए कभी भगवान को भी अपने द्वार बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। शायद इसमें भी ऊपर वाले की ही कोई माया रही होगी।


वैसे, आजकल की युवा पीढ़ी से, आचार-विचार और व्यवहार


में काफी अलग था - रोहित। पूजा-अर्चना में विश्वास रखना, नियमित रूप से मंदिर जाना, प्रसाद ग्रहण करना, ये सब चीजें उसे एक सुखद अनुभूति का एहसास कराती थीं। मंदिर की टनटन बजती घंटियां, शंख की ध्वनि, धूप, कपूर, हवन सामग्री और दीपों को मनमोहक खुशबू, हमेशा उसे अपनी ओर आकर्षित किया करती थीं।

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"स्कूल की दुकान प्राइवेट लिमिटेड"


कोरोना काल में एक दो का नहीं, बल्कि मध्यम वर्गीय लगभग सभी परिवारों का बुरा हाल था। यही वो श्रेणी होती है जो कुछ भी अलग सा होने पर आर्थिक रूप से सबसे ज्यादा प्रभावित होती है। यह वक्त भी ऐसा ही था। किसी के पास नौकरी नहीं थी, तो कोई आधी तनख्वाह लेकर काम करने पर र मजबूर था, किसी का काम धंधा मंदा, तो किसी का ठप्प ही हो चला था। खर्चे उतने ही थे, कम होना तो दूर उल्टा बढ़ जरूर गए थे। जब स्कूल भी घर से, ऑफिस भी घर से चलेगा, तो लैपटॉप, मोबाइल, AC, लाइटें, पंखे सब का खर्च भी बढ़ेगा। बिजली और ब्रॉडबैंड के बढ़े बिलों के अलावा घर का किराया, EMI, फोन, घर का राशन पानी सब खाने को दौड़ता सा नजर आता था। ऐसे में करें तो करें क्या कुछ समझ नहीं आ रहा था।

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हिस्सा बनने नहीं दिया जाएगा, और उनकी ID को ब्लॉक कर दिया जाएगा, शिक्षा के मौलिक अधिकार से उन्हें वंचित रहने पर मजबूर कर दिया जाएगा। कुल मिलाकर इस से ये साबित हो गया कि प्रधानाचार्य नहीं है। के अपने ही हस्ताक्षर और आश्वासन का कोई महत्व न


5 महीने पहले अपनी नौकरी चले जाने का हवाला देते हुए कई बार प्रार्थना के बाद भी जब स्कूल अपनी वसूली वाली ज़िद पर अड़ा रहा तो अक्षरा के पिता ने एक पर्सनल लोन लेकर स्कूल वालों को सारे पैसों का भुगतान तो कर दिया, लेकिन स्कूल ने कहीं न कहीं अभिषेक दी उनके ही जैसे कई अभिभावकों का विश्वास तोड़ दिया, भरोसा छलनी कर दिया। यां


बच्चों की पढ़ाई से आखिर दुनिया के कौन से मां बाप होंगे जो समझौता. 



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